उत्तराखंड

उत्‍तराखंड में कैग की रिपोर्ट में पकड़ी गई 305 करोड़ की वित्तीय गड़बड़ी, पढ़ि‍ए पूरी खबर

देहरादून। भारत के नियंत्रक एवं महालेखापरीक्षक (कैग) की रिपोर्ट में 305.75 करोड़ रुपये के कार्यों/योजनाओं में वित्तीय गड़बड़ी पकड़ी गई है। यह रिपोर्ट 31 मार्च, 2020 को समाप्त हुए वित्तीय वर्ष के कार्यों की है। इस रिपोर्ट को गैरसैंण में विधानसभा सत्र के दौरान पटल पर रखा गया। मुख्य रिपोर्ट में विभिन्न विभागों के लेखा परीक्षण के साथ ही भारत नेपाल सीमा सड़क परियोजना (टनकपुर-जौलजीबी मार्ग) की खामियों को विस्तृत ढंग से उजागर किया गया है। इसके अलावा कैग ने स्वास्थ्य सेवाओं की स्थिति को भी अलग रिपोर्ट के माध्यम से कठघरे में खड़ा किया है। वित्तीय गड़बड़ि‍यों की बात करें तो टनकपुर-जौलजीबी मार्ग पर नियमों की अनदेखी व ठेकेदार की लापरवाही से सरकार पर 1.92 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बोझ भी पड़ा। साथ ही इस परियोजना का थर्ड पार्टी ऑडिट भी न कराया जाना पाया गया। वहीं, 9.21 करोड़ रुपये के ऐसे व्यय थे, जिन्हें मनमर्जी से भिन्न मद में खर्च कर दिया गया। कैग ने इस बात पर भी आपत्ति लगाई है कि सामरिक महत्व की परियोजना अधिकारियों की लापरवाही से वर्ष 2012-13 से अब तक लंबित है। इससे परियोजना की लागत भी बढ़ रही है। उधर, स्वास्थ्य विभाग की रिपोर्ट में कैग ने बताया है कि रोगी भार के मुताबिक जो संसाधन राज्य में जुटाए जा रहे हैं, वह मार्च 2011 के शासनादेश के अनुरूप हैं। वर्ष 2014 से 19 तक इसमें किसी तरह के संशोधन नहीं किए गए। पर्वतीय क्षेत्रों में चिकित्सकों की भारी कमी है, जबकि मैदानी क्षेत्रों में यह अनुपात ठीक है। इसके अलावा भी तमाम बिंदुओं पर स्वास्थ्य विभाग की कार्यप्रणाली को कठघरे में खड़ा किया गया है। कैग की रिपोर्ट लोनिवि, राजस्व/कर संबंधी विभागों आदि के कार्यों व सेवाओं की अनियमितता भी उजागर की गई हैं। कर वसूली में ही कैग ने 240 करोड़ रुपये से अधिक की क्षति सरकार को पहुंचाने का जिक्र रिपोर्ट में किया है।

चार साल में 52 फीसद बढ़ा राज्य का खर्च

कैग रिपोर्ट में वर्ष 2014-15 से वर्ष 2018-19 के दौरान राज्य की वित्तीय स्थिति पर भी फोकस किया गया है। बताया गया है कि राज्य के कुल खर्चे 26 हजार, 254 करोड़ रुपये से बढ़कर 38 हजार, 564 करोड़ रुपये हो गए हैं। यानी चार साल में खर्चों में 21 हजार, 164 करोड़ रुपये का इजाफा (52 फीसद) हुआ है। इन खर्चों में भी 81 से 84 फीसद सिर्फ राजस्व व्यय जैसे वेतन, प्रशासनिक आदि शामिल हैं। चार सालों में राजस्व व्यय 15 फीसद सालाना दर से बढ़ा, जबकि राजस्व प्राप्तियां 13 फीसद की सालाना औसत दर से ही बढ़ पाईं। थोड़ा राहत की बात यह जरूरी दिखी कि वर्ष 2017-18 में जो राजस्व प्राप्ति 27 हजार 105 करोड़ रुपये थी, वह वर्ष 2018-19 में बढ़कर 31 हजार 216 करोड़ रुपये हो गई।

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