Friday, March 6, 2026
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उत्तराखंड

भ्रष्टाचार: UPCL में 17 लाख रुपए सरकारी पैसे का हो गया गबन, बड़ा सवाल: जब उपनल कर्मी पर गिरी गबन की गाज तो सरकारी कर्मी कैसे हो गए पाक साफ ??

यूपीसीएल के ऋषिकेश विद्युत वितरण खंड में लगभग दो महीने पहले 17 लाख रुपये के गबन का मामला सामने आया था। जिसकी भनक लगते ही अधिशासी अभियंता शक्ति प्रसाद ने अपने स्तर से जांच समिति बनाकर रिकवरी करा आरोपी महिला उपनल कर्मी को नौकरी से बाहर का रास्ता दिखाने का काम किया, जिसके दस्तावेज hindinews.media के पास उपलब्ध है। वहीं विभागीय सूत्रो की माने तो यूपीसीएल के ऋषिकेश विद्युत वितरण खंड में कार्यरत महिला कर्मचारी वर्षों से अस्थायी बिजली कनेक्शनों की सिक्योरिटी राशि उपभोक्ताओं को लौटाने के बजाय अपने खातों में जमा करा रही थी। वहीं इसमें बड़ी बात विभाग से जो निकलकर सामने आई है कि अधिशासी अभियंता ने अधीक्षण अभियंता या उनसे ऊपर के किसी भी अधिकारी को गबन के पूरे मामले में अंधेरे में रखने का काम किया। उच्चस्तर पर मामला संज्ञान में आने के बाद अब इस पूरे प्रकरण में लीपापोती होती हुई नजर आ रही है। गबन जैसा गंभीर मामला होने के बाद भी अभी तक विभाग की तरफ से कोई एफआईआर का दर्ज नहीं कराना कई सवालों को जन्म देता है। बड़ी बात यह भी है की उपनल कर्मी को कैसे सरकारी पैसे की लेनदेन करने की जिम्मेदारी सौंपी गई और क्यों उनके काम को समय समय पर चेक नही किया गया। बताया जा रहा है कि इस वितरण खंड में अधिकारी-कर्मचारी वर्षों से जमे हैं। जिनके दस्तावेज hindinews.media के पास तैनाती की तारीखों के साथ उपलब्ध है। वहीं विभागीय अधिकारियों का साफ कहना है कि तबादला होने के बाद उसे रुकवाने के लिए मौजूद कर्मचारी राजनीतिक रसूख का भी इस्तेमाल करते हैं। साथ ही एक कर्मचारी जिसको खुद अधिशाषी अभियंता शक्ति प्रसाद ने पूरे मामले में प्रथम दृष्टि में दोषी मानते हुए तबादला किया था, वो भी अभी तक यहीं पर मौजूद है और उसको रिलीव नही किया गया है। अब यह कर्मचारी किसके आदेश और रसूख के चलते रिलीव नही हो पाया, यह भी जांच के दायरे में आना चाहिए।

 *अधिकारी संदेह के घेरे में* 

यूपीसीएल का नियम है कि उपभोक्ताओं से जो भी सिक्योरिटी राशि जमा कराई जाती है, उसकी डिमांड लिस्ट बनाकर ई-मेल से यूपीसीएल मुख्यालय को आती है। वहीं विभागीय सूत्रो की माने तो महिला कर्मचारी जो सूची बनाकर यूपीसीएल को भेजती थी, वह एप्रूवल के बाद बैंक भेजने से पहले बदल देती थी। सवाल उठ रहे कि सूची बैंक या मुख्यालय में तभी वैध मानी जाती है, जब उस पर ‘अधिशासी अभियंता व अकाउंटेंट के हस्ताक्षर हों। लिहाजा, कई अधिकारी भी इस गबन के मामले में सवालों के घेरे में आ रहे हैं।

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